Thursday, 25 December, 2008
दहेज़
अर्थी चढी हजारों कन्या, बैठ न पाई डोली में
जिस पर बीतती वाही जानता है, शब्द नहीं ये कहने के
कितनो ने बेचे मकान है, अब तक अपने रहने के
फ़िर भी वे रुके नहीं है, अब तक मानवता की भाषा में
अपनी मांग बढ़ते जाते, परधन की अभिलाषा में
आग लगे ऐशे दहेज़ को, मानवता की टोली में
लाखों घर बरबाद हो गये, इस दहेज़ की बोली में॥
अर्थी चढी हजारों कन्या, बैठ न पाई डोली में
तुमको भी दुःख होगा, अपनी कन्याओं की शादी में
मन ललचाना बंद करो, अब धैर्य रखो निज आधी में
कितनो ने अपनी कन्या के, पीले हाथ करने में
कहाँ -कहाँ न मस्तक टेके, आती शर्म बताने में
गहने, खेत, मकान रख दिए, सिर्फ़ मांग की रोली में
लाखों लोग बर्बाद हो गये, इस दहेज़ की बोली
में अर्थी चढी हजारों कन्या, बैठ न पाई डोली में
गंजे मित्र
हर एंगल से विचित्र थे
एक दिन वे मेरे पास आए
...और रोने लगे..
अपने आंशुओ से मेरे कपडे भिगोने लगे
मैंने पुछा क्या बात है भइये
वो बोले मुझे तो मर जाना चाहिए
अपना व्यथा सुनाने लगे
कहने लगे
एक बार मैं अपने घर की सफाई कर रहा था
इधर का समान उधर कर रहा था
अचानक मेरी जवानी की फोटो गिर गई
उस समय मेरे घने-२ बाल थे
जो देखने में बड़े बेमिसाल थे
इत्तेफाक से वो मेरे बेटे को मिल गई..
बेटे ने पुछा माँ ये किसकी तस्वीर है
बेटा बलवीर ये है तेरे बाप की तस्वीर
बेटा बोला तो ये गंजा कौन बैठा रहता है
Wednesday, 19 November, 2008
संतोषम परम सुखम
संसार में मनोवांछित परिस्थितियों में सब कोई नहीं रह पता है हर एक को कोई न कोई आभाव रहता ही है यदि इसी कारण लोग असंतुष्ट रहने लगें तो फ़िर सारी दुनिया में एक भी व्यक्ति सुखी नहीं दिखाई देता, पर सोचो ऐशा नहीं है, अनेक मुसीबतों से से घिरे ऐसे व्यक्ति आज भी मौजूद है जो जीवन को संघर्ष मानकर यह लड़ई जितने के लिए निरंतर कोशिश करते रहते है साथ ही वर्तमान में जो कुछ भी सामने है उससे दुखी नहीं होते है उसे प्रभु की अनुकंपा मानकर अपना मन प्रसन्न रखते है और संतोष की साँस लेते हुए जीवन की यात्रा को आगे बढ़ते रहते है कुछ लोगों का कहना है की संतोष कर लेने से प्रगति रुक जाती है और उन्नति के प्रयतन कमजोर हो जाते है यह बातें अस्थिर मन वालों के ऊपर लागु होती है विवेकशील व्यक्ति अपने जीवन को कभी क्रमबद्ध व्यवस्था के रूप में विनार्मित करते है और वे अच्छी तरह से जानते है कि असंतुलित खिन्न और उद्विग्न मन से कुछ कर सकना तो कुछ सोच सकना भी कठिन है इसलिए हमें संतुष्ट रहना चाहिए आज जो हमारे पास है उसके लिए प्रभु को धन्यवाद देना चाहिए
Saturday, 15 November, 2008
ओसामा Vs ओबामा
ओसामा :- आदाब अर्ज है भाई ओबामा
ओबामा :- जय हनुमान जी की भाई ओसामा
ओसामा :- क्या इतिफाक है की हमारे नाम कितने मिलते है
ओबामा :- गनीमत है की हमारे काम नही मिलते है
ओसामा :- बात क्या है , अमेरिका के रस्त्रियापति बनते है तुम काफिरों की जुबान बोलने लगे हो
ओबामा :- काफिर कम से कम इंसान तो होते है तुम्हारी तरह बारूद तो नही उगलते है
ओसामा :- यानी हमारी दुसमनी चलती रहेगी, इंडिया की तरह किसी दलित अशेवेत के गद्दी पर बैठते ही तुम गोरे वामन जैसे क्यूं हो रहे हो ,
ओबामा :- किसी इंडियन श्लोक मैं कहा गया है की , " हम काले है तो क्या हुआ दिलवाले है, आगे ये है की हम तेरे तेरे चाहने वाले है,
ओसामा:- ये तेरे तेरे तेरे क्या है
ओबामा:- पवन पुत्र हनुमान
ओसामा :- लाहोल बिला कुवत
ओबामा :- क्या हुआ रावन
ओसामा :- खामोश रहो , खामोश रहो, सुना है की तुम अपने ऑफिस मैं गाँधी जी की तस्वीर रखते हो , शर्म नही आती,
ओबामा ;- कुछ दिनों तक तस्वीर तुम भी लटका लो बिरादर, तुम्हे भी आने लगेगी
ओसामा:- क्या?
ओबामा:- शर्म और क्या? कुछ दिनों दहशत गर्दी से परहेज करके तो दिखो
ओसामा:- तब तो मैं हिंदुस्तान का सर्व्यदैया कार्यकर्ता लगने लगूंगा ऐसी ज़िन्दगी से तो मौत आच्छी , जब तक अमेरिका की दूसरी ईमारत ना गिरा दूँ, तब तक आराम हराम है अमां तुम तो बुश के भाई निकले भारत से तो तुमने हनुमान और गाँधी के लिए हमसे और पकिस्तान से क्या लोगे
ओबामा :- तुम दोनों से तुम्हारा आतंक हीन लूँगा
ओसामा :- फ़िर हम दोनों करंगे क्या ?
ओबामा:- हनुमान चालीसा पढ़ना
ओसामा:- ज्यादा हनुमान, हनुमान मत करो तुम्हारे हनुमान ने भी लंका में बलवा मचाया था की नहीं आगजनी की थी की नहीं वोह बजरंग बली है की बजरंग दली ?
ओबामा:- सोर बजरंगी बदरंगी नहीं है एक कविता सुनो
ओसामा:- अब ज्यादा अटल बिहारी बाजपयी मत बनो अपने यहाँ भी आर्थिक मंदी को समझाओ-बुझाओ वो नई घोडी की तरह सबको लतिया रही है उसके कारन हमें एक दो की जगह दर्जन-२ धमाके करने पड़ रहे है नंगो के बैंक लूट रहे है कशमीर मसले पर बैठ कर हिंदुस्तान और पकिस्तान के साथ चौधराहट करो भला वो बन्दर क्या बन्दर जो बन्दर बाँट न करे तन तो काला है मन भी काला करो अमेरिका कहीं के
ओबामा :- तुम कभी नहीं सुधरोगे आधे मुशर्रफ़ कहीं के मैं तुझ रंगभेद-नस्लभेद की तरह मिटा दूँगा बिरादर
ओसामा:- आतंक की कोई नस्ल नहीं होती कहा भी गया है किसी इंडियन श्लोक में
ओबामा:- क्या कहा गया है ?
ओसामा:- यही की मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे.......वगैरा-वगैरा
Thursday, 16 October, 2008
भारतीय योग शास्त्र
चित वृतियों पर नियंत्रण और उस का विरोध ही दर्शन शास्त्र में योग शब्द से विभूषित हुआ है। जब ऎसा हो जाता है और ऎसा होने पर उस व्यक्ति को भूत और भविष्य आंकने मे किसी प्रकार की कोई परेशानी नही होती, वह अपने संकेत से ब्रह्मण्ड को चलायमान कर सकता है।
भारतीय योग शास्त्र मे इसके पांच भेद बताए गए हैं-
हठ योग
ध्यान योग
कर्म योग
भक्ति योग
ज्ञान योग
मूलत: मनुष्य मे पांच मुख्य शक्तियां होती है उन शक्तियों के अधार पर ही योग के उपर लिखे भेद या विभाजन संभव हो सका है। प्राण शक्ति का हठ योग से, मन शक्ति का ध्यान योग से, क्रिया शक्ति का कर्म योग से, भावना शक्ति का भक्ति योग से, बुद्धि शक्ति का ज्ञान योग से पूर्णत: सम्बन्ध है । वर्तमान काल मे इस विष्य पर जो ग्रन्थ प्राप्त होते है उन मे हठ योग प्रदीपिका, योग दर्शन, गोरख संहिता, हठ योग सार, तथा कुण्ड्क योग प्रसिद्ध हैं। पतांजलि का योग दर्शन इस सम्बन्ध मे प्रमाणिक ग्रन्थ माना गया है।
महार्षि पतांजलि ने चित की वृतियों का विरोध योग के माध्यम से बताया है और उनके अनुसार योग के आठ अंग हैं, जो कि निम्नलिखित हैं
१ यम २ नियम ३ आसन ४ प्रणाय़ाम ५ प्रत्याहार ६ धारणा ७ ध्यान
८ और समाधि
ऊपर जो आठ अंग बताए गए हैं उनमे से प्रथम पांच अंग बाहरी तथा अन्तिम तीन अंग भीतरी या मानसी कहे गए हैं।
यम:- अहिंसा, सत्य,अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह का व्रत पालन ही 'यम' कहा जाता है।
नियम:- स्वाध्याय, सन्तोष, तप, पवित्रता, और ईश्वर के प्रति चिन्तन को नियम कहा जाता है।
आसन:- सुविधापूर्वक एक चित और स्थिर होकर बैठने को आसन कहा जात है।
प्राणायाम:- श्वास और नि:श्वास की गति को नियंत्रण कर रोकने व निकालने की क्रिया को प्राणायाम कहा जाता है।
प्रत्याहार:- इन्द्रियों को अपने भौतिक विषयों से हटाकर चित मे रम जाने की क्रिया को प्रत्याहार कहा जाता है।
जब यह पांच कर्त्तव्य सिद्ध हो जातें हैं या इनमे से जब कोई साधक पूर्णता प्राप्त कर लेता है तभी उसे योग के आगे की क्रियायों मे प्रवेश की अनुमति दी जाती है। प्रत्येक साधक को चाहिए कि वह बाह्य अभ्यासों को सिद्ध करने के बाद ही आगे के तीन अभ्यासों मे प्रवेश करें तभी उसे आगे के जीवन मे पूर्णता प्राप्त हो सकती है।
धारण:- चित्त को किसी एक विचार मे बांध लेने की क्रिया को धारण या धारणा कहा जाता है।
ध्यान:- जिस वस्तु को चित मे बांधा जाता है उस मे इस प्रकार से लगा दें कि बाह्य प्रभाव होने पर भी वह वहां से अन्यत्र न हट सके, उसे ध्यान कहते है।
समाधी:- ध्येय वस्तु के ध्यान मे जब साधक पूरी तरह से डूब जाता है और उसे अपने अस्तित्व का ज्ञान नही रहता है तो उसे समाधी कहा जाता है।
Saturday, 20 September, 2008
शिक्षक और शिष्य
हमारे समस्त धार्मिक ग्रन्थ यह बात बताते है की शिक्षक और शिष्य का सम्बन्ध पिता और पुत्र से भी बढ़ कर है क्योंकि पिता ने तो मुझे ये अमूल्य शरीर प्रदान किया है परन्तु शिक्षक ने जीवन मे आगे बढ़ने के लिए सदेव प्रयास किया है, शिक्षक निर्माण कर रास्ता बताता है, शिष्य का भी ये कर्त्तव्य है की अपने शिक्षक को सब से ऊपर रखे और पुरा सम्मान दे
आज की हालात में शिक्षा का इस्टर अत्यंत ही नीचे चला गया है , आज शिक्षक और शिष्य के बीच मे गहरी खाई बन गई है, आज का छात्र आपने शिक्षको के प्रति आदर भावः नही रखता है, उसके काम आशोभानिये हो रहे है , आज का छात्र अपने शिक्षक के साथ अभ्रद व्यवहार करने में, उसे नीचा दिखाने, अजीब गरीब सवालो को करने से जरा भी नही हिच्कचाता है तो क्या इस पूरे समस्या के जिमेदार छात्र ही है आज के शिक्षक की मानसिकता भी बदल चुकी है, ये शिक्षक जिस तरह से छात्रो के साथ बर्ताव करते है,छात्र भी उसी प्रकार से पेश आते है, यदि कोई छात्र आर्थिक समस्या के कारन किसी शिक्षक से टूशन नही पढ़ पता है तो उसे शिक्षक के क्रोध का सामना करना पड़ता है,जिसके प्रतिक्रिया में शिष्य ऐसी हरकते करता है, इस समस्या के अतिरिक्त और भी कारन है जिस के कारन शिक्षक और शिष्य के बीच सम्बन्ध ख़राब हो रहे है,
परन्तु मैं तो इस छोटे से लेख के मधियम से अपने छात्र दोस्तों से यही कहूँगा की हमे परस्थितियों को अपने अनुकूल बनते हुए किसी भी तरह की कोई भी ग़लत कार्य नही करना चाहिए जिससे हमारे और शिक्षक के मधीय कोई बैमानी समस्या आए, और शिक्षको को भी अपनी मानसिकता बदलनी होगी और ज्यादा से ज्यादा अपने शिष्यों की सहियता करनी चहिये , तभी वे पूरे सम्मान के काबिल हो पाएँगे
Saturday, 30 August, 2008
आज के नेताओ की गाथा
देश हमारे बाप का,
जितना चाहूँ उतना खाउओं,
क्या जाता आपके बाप का "
मेरे घर में छापा डाले, किसकी ये औकात है,
कोतवाल ही ताऊ मेरा, इस्पेक्टर हमारा है
मेरे दो दो मुह है भइया, एक नर का और एक सांप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का
मेरे पुरखे जेल गए थे, मैं भी गया तो क्या बुरा किया,
वो आज़ादी लेकर निकले, मैंने उसको डुबो दिया
मैं नेताओं का नेता हूँ, कोई न मेरी नाप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का
मेरे घपलों के रिकॉर्ड को कोई तोड़ न पाया है,
घपले बाज़ी में ही भारत को गोल्ड मैडल दिलवाया है,
मैं छोटा खेल न खेलों, खेल खेलता मैं टॉप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का
बाचे आपके पार ला दूँ, चिंता उतनी यार है,
बार बार नही मरना मुझ को मरना तो एक बार है,
देखा जाएगा , जब घडा भरेगा मेरे पाप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का
देश न इसका , देश न उसका,
देश हमारे बाप का,
जितना चाहूँ उतना खाउओं,
क्या जाता आपके बाप का