Saturday, 30 August 2008

आज के नेताओ की गाथा

" देश न इसका , देश न उसका,
देश हमारे बाप का,
जितना चाहूँ उतना खाउओं,
क्या जाता आपके बाप का "

मेरे घर में छापा डाले, किसकी ये औकात है,
कोतवाल ही ताऊ मेरा, इस्पेक्टर हमारा है
मेरे दो दो मुह है भइया, एक नर का और एक सांप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का

मेरे पुरखे जेल गए थे, मैं भी गया तो क्या बुरा किया,
वो आज़ादी लेकर निकले, मैंने उसको डुबो दिया

मैं नेताओं का नेता हूँ, कोई न मेरी नाप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का
मेरे घपलों के रिकॉर्ड को कोई तोड़ न पाया है,
घपले बाज़ी में ही भारत को गोल्ड मैडल दिलवाया है,

मैं छोटा खेल न खेलों, खेल खेलता मैं टॉप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का
बाचे आपके पार ला दूँ, चिंता उतनी यार है,
बार बार नही मरना मुझ को मरना तो एक बार है,

देखा जाएगा , जब घडा भरेगा मेरे पाप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का

देश न इसका , देश न उसका,
देश हमारे बाप का,
जितना चाहूँ उतना खाउओं,
क्या जाता आपके बाप का


आधुनिक बाप

आधुनिक बाप
एक बच्चे को मिटटी खाता देख ,
मैंने उसके पिताजी से कहा
भाई साहब आप का बेटा मिटटी खा रहा है,
बाचे का बाप ऐठ कर बोला ,
खाने दे तेरे बाप का क्या जा रहा है,
अगर मेरा बेटा मिटटी खा रहा है,
ये तो अपना भविष्य बना रहा है,
हम इसे पढ़एंगे,लिखानेगे ,
बहुत बड़ा सिविल इंजिनियर बनाएँगे ,
फ़िर देखना ये अपना चमत्कार दिखेगा ,
हजारो कुंतल लोहा सरिया, सीमेंट ,
आराम से खा जाएगा
डकार भी नही लेगा, लाखो में खेलेगा ,
मान लो ये करम जला,
ठीक से पढ़ लिख नही पाया,
तो नेता तो बन ही जाइएगा,
फ़िर तो और मज़ा आएयेगा ,
आज मिटटी खा रहा है,
कल पुरा देश ही खा जाइएगा।

Tuesday, 12 August 2008

रक्षा-बंधन

सम्पूर्ण भारत वर्ष में हिन्दुओ के प्रमुख त्यौहारों में रक्षा बंधन का स्थान अहम् है रक्षा बंधन दो शब्दों से मिल कर बना है, रक्षा + बंधन ,जिसका शाब्दिक अर्थ है रक्षा बंधन होता है पर यदि हम गहराई में सोचे तो हमे मिलेगा की एक बहन के द्वारा भाई की सम्पूर्ण भाविष्य हेतु की गई कामना है असीम प्यार से कलाई पर बंधे गए धागों को रक्षा बंधन की संज्ञा देते है,इस बंधन के द्वारा एक बहन अपने भाई को ज़िन्दगी भर के लिए अटूट प्रेम एवं विश्वास के दायरे में रख देती है , ये अटूट कच्चे धागों का प्यार भाई के सुखमय जीवन हेतु की गई कामना को भी दर्शाता ही है साथ ही साथ भाई के कर्तव्य को भी इंगित करता है एक भाई का ये नेतेक परम कर्तव्य बन जाता है की जीते जी उसकी बहन को को परेशानी न हो और जितना हो सके उतना प्यार दुलार वो अपनी बहन पर लुटाए एक बहन भाई की कलाई पर कच्चे धागे की डोरी बंधाते हुए मन ही मन जो कामनाए करती है उसको हम इस सवैये के मधियम से व्यक्त कर रहा हूँ,

" प्रेम हमारा बना रहे, हर भाई के राग-राग में जग में वो न्याय प्रतिष्ठा पावे,
दुःख दर्द से दूर रहे मेरा भाई, दही माखन दूध का भोग उडावे ,
कीर्ति आनंद का रतन मेले , होके स्वतंत वह,
जग में सफलता के धवजा फेहेरावे ,
दीपक की सी लो लेकर वह , जग में नाम कमावे ,
दिन दुखी की सेवा करके , अबला वन की लाज बचावे "

इतना ही नही एक भाई अपनी बहन के बारे में बहुत ही अच्छे -अच्छे विचारो को सोचता है, राखी बंधने के समय जिस तरह की अभिलाषा इच्छाएँ एक भाई के मन में अपनी बहन के प्रति होती है उनको चंद पंक्तियों में मधियम से व्यक्त किया जा रहा है-
"अम्बर में जितने तारे हो,
जीवन में उतनी बहारें हो
धरती पर जितना उपवन हो,
वो सारे सुमन तुम्हारे हो,
सजी रहे खुशियों की महफिल ,
सदा रहो खुशाल ,
सलामत रहे प्रभु बहन हमारी
वो जिए हजारो साल "

स्वधेनता दिवस

"स्वर से अपने कबर तुम्हारी खुदा रहा हूँ , खुदा कसम मैं,
किया है तुमने जो जुल्म हम पर सुना रहा हूँ, खुदा कसम मैं,"
अंग्रेजो की २०० वर्षो की जालिम हरकतों ने भारतियों को कैदें - बा -मुसक्कत रखते हुए नींदे हराम कर दी मगर उन्हें नही पता था की भारत माँ की कोख से जन्म लेने वाले, उनकी गोलियों से उनको ही मार कर उन्हें इस देश और मुल्क से बेपन्हा कर देंगे,१५ अगस्त १९४७ का वो स्वर्णिम दिन अपनेआप में ही अतीत का नज़ारा हमारी आँखों के सामने ला देता है , इस आज़ादी को प्राप्त करने के लिए हमारे अमर सपूतो ने कोई कसर बाकि नही रखी और न ही हमारी माँ बहनों के दिलो दिमाग पर इस चीज़ का जरा सा भी भय आया की उनके मांगो का सिंदूर बिखर जाइएगा, अतीत कर दर्द भरे दिनों को याद करते हुए मिर्जा ग़ालिब कर यह शेर जुबा पैर आ जाता है-
"शहीदों की चिताओ पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालो कर यही बाकि निशा होगा"
१८५७ के प्रथम स्वतंत्र संग्राम से लेकर १९४७ के भीषण रक्त पात एवं नर संहार की कहानी हमारे देश के प्रतेयक युवा वर्ग की नसों में बह रहे रक्त में एक अजब सा जोश ला देती है इस आज़ादी को हमे बरकरार रखना होगा उन वीर सपूतो के अरमानो तथा उनके द्वारा किए गए सतत प्रयासों पैर हमे अपनी द्रष्टि डाल कर अपने अंदर भी आस, हिमत और होसलो कर एक चिराग जलाए रखना होगा और हमें किसी भी कीमत पर अपनी आज़ादी की हसरतो को बरकरार रखना होगा

"अपनी आज़ादी को हम हार्गिज मिटा सकते नही,
सर कटा सकते है लेकिन सर झुका सकते नही "
हमारे वीर सपूतो की आशाओ , दृढ निश्चय
एवं सकारात्मक प्रयास जोर जोर की आवाजो से हमे आगाह कर रहे है , उनके पक्के इरादों में भी सफलता की चिंगारी देखने को मिलती थी

"हमारी आहो जारी से यह शाही रह न जायेगी , उन्ही की गोलिया उनको जहनुम भी दिखाएंगी ,
अगर हम आज मरते है तो कल तुम भी यह देखोगे , उन जालिमो की हस्ती भी यहाँ पर न रह पायेगी "

उन अमर शाहिदो पर हमें नाज़ होने चहिये जिनका नजरिया कुछ इस तरह था

"मैं स्वतंत्रता कर पागल प्रेमी मुझे जा की परवाह नही ,
शूलो से मेरा नाता है फूलो की मुझे चाह नही,
मरने पर भी ,स्थान पर लिखा मिलेगा स्वतंत्रता ,
लपटों में संदेश क्रांति की, देनी होगी मेरी लाल चिता"