" देश न इसका , देश न उसका,
देश हमारे बाप का,
जितना चाहूँ उतना खाउओं,
क्या जाता आपके बाप का "
मेरे घर में छापा डाले, किसकी ये औकात है,
कोतवाल ही ताऊ मेरा, इस्पेक्टर हमारा है
मेरे दो दो मुह है भइया, एक नर का और एक सांप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का
मेरे पुरखे जेल गए थे, मैं भी गया तो क्या बुरा किया,
वो आज़ादी लेकर निकले, मैंने उसको डुबो दिया
मैं नेताओं का नेता हूँ, कोई न मेरी नाप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का
मेरे घपलों के रिकॉर्ड को कोई तोड़ न पाया है,
घपले बाज़ी में ही भारत को गोल्ड मैडल दिलवाया है,
मैं छोटा खेल न खेलों, खेल खेलता मैं टॉप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का
बाचे आपके पार ला दूँ, चिंता उतनी यार है,
बार बार नही मरना मुझ को मरना तो एक बार है,
देखा जाएगा , जब घडा भरेगा मेरे पाप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का
देश न इसका , देश न उसका,
देश हमारे बाप का,
जितना चाहूँ उतना खाउओं,
क्या जाता आपके बाप का
Saturday, 30 August 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment