Thursday, 25 December 2008

दहेज़

लाखों लोग बर्बाद हो गये, इस दहेज़ की बोली में
अर्थी चढी हजारों कन्या, बैठ न पाई डोली में
जिस पर बीतती वाही जानता है, शब्द नहीं ये कहने के
कितनो ने बेचे मकान है, अब तक अपने रहने के
फ़िर भी वे रुके नहीं है, अब तक मानवता की भाषा में
अपनी मांग बढ़ते जाते, परधन की अभिलाषा में
आग लगे ऐशे दहेज़ को, मानवता की टोली में
लाखों घर बरबाद हो गये, इस दहेज़ की बोली में॥
अर्थी चढी हजारों कन्या, बैठ न पाई डोली में

तुमको भी दुःख होगा, अपनी कन्याओं की शादी में
मन ललचाना बंद करो, अब धैर्य रखो निज आधी में
कितनो ने अपनी कन्या के, पीले हाथ करने में
कहाँ -कहाँ न मस्तक टेके, आती शर्म बताने में
गहने, खेत, मकान रख दिए, सिर्फ़ मांग की रोली में
लाखों लोग बर्बाद हो गये, इस दहेज़ की बोली
में अर्थी चढी हजारों कन्या, बैठ न पाई डोली में


गंजे मित्र

एक गंजे हमारे मित्र थे
हर एंगल से विचित्र थे
एक दिन वे मेरे पास आए
...और रोने लगे..
अपने आंशुओ से मेरे कपडे भिगोने लगे
मैंने पुछा क्या बात है भइये
वो बोले मुझे तो मर जाना चाहिए
अपना व्यथा सुनाने लगे
कहने लगे
एक बार मैं अपने घर की सफाई कर रहा था
इधर का समान उधर कर रहा था
अचानक मेरी जवानी की फोटो गिर गई
उस समय मेरे घने-२ बाल थे
जो देखने में बड़े बेमिसाल थे
इत्तेफाक से वो मेरे बेटे को मिल गई..
बेटे ने पुछा माँ ये किसकी तस्वीर है
बेटा बलवीर ये है तेरे बाप की तस्वीर
बेटा बोला तो ये गंजा कौन बैठा रहता है

Wednesday, 19 November 2008

संतोषम परम सुखम

अधिकतर मनुष्य अपनी वर्तमान परिस्थितियों में बहुत ही खिन्न और परेशान होते दिखाई देती है असंतुष्ट होकर निराशामायी भविष्य देखते रहते है वस्तुओं की कमी एंव परिस्थितियों की प्रतिकूलता के कारण जितना कष्ट होता है उससे कहीं अधिक नकारात्मक सोच से होता है ऐसे व्यक्तियों का मानसिक संतुलन ठीक न होने के कारण वे समस्याओं के निवारण का मार्ग भी नहीं खोज पते है वस्तुतः उनकी चिंता इस असंतोषमयी स्थिति के कारण सुधरने के बजाये ख़राब होती जाती है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में जिन्होंने जान लिया है की सुख त्याग में है, दुःख कब्जे में है वे संतुष्ट है संतोष में ही सुख है वस्तुओं का रखरखाव करने वाला कभी सुखी नहीं रहता है क्योंकि उसे कमी ही दिखती रहती है, वह एक आभाव के पूरा होने पर दूसरा आभाव बाद तीसरे,चौथे और पाँचवे के लिए रोता रहता था कभी भी उसे सब कुछ नहीं मिल पता है आज अधिकतर व्यक्तियों की आन्तरिक स्थिति यही है वे जीते तो है पर कोई आनंद एंव संतोष का अनुभव नहीं करते है

संसार में मनोवांछित परिस्थितियों में सब कोई नहीं रह पता है हर एक को कोई न कोई आभाव रहता ही है यदि इसी कारण लोग असंतुष्ट रहने लगें तो फ़िर सारी दुनिया में एक भी व्यक्ति सुखी नहीं दिखाई देता, पर सोचो ऐशा नहीं है, अनेक मुसीबतों से से घिरे ऐसे व्यक्ति आज भी मौजूद है जो जीवन को संघर्ष मानकर यह लड़ई जितने के लिए निरंतर कोशिश करते रहते है साथ ही वर्तमान में जो कुछ भी सामने है उससे दुखी नहीं होते है उसे प्रभु की अनुकंपा मानकर अपना मन प्रसन्न रखते है और संतोष की साँस लेते हुए जीवन की यात्रा को आगे बढ़ते रहते है कुछ लोगों का कहना है की संतोष कर लेने से प्रगति रुक जाती है और उन्नति के प्रयतन कमजोर हो जाते है यह बातें अस्थिर मन वालों के ऊपर लागु होती है विवेकशील व्यक्ति अपने जीवन को कभी क्रमबद्ध व्यवस्था के रूप में विनार्मित करते है और वे अच्छी तरह से जानते है कि असंतुलित खिन्न और उद्विग्न मन से कुछ कर सकना तो कुछ सोच सकना भी कठिन है इसलिए हमें संतुष्ट रहना चाहिए आज जो हमारे पास है उसके लिए प्रभु को धन्यवाद देना चाहिए

Saturday, 15 November 2008

ओसामा Vs ओबामा

ओसामा :- आदाब अर्ज है भाई ओबामा
ओबामा :- जय हनुमान जी की भाई ओसामा
ओसामा :- क्या इतिफाक है की हमारे नाम कितने मिलते है
ओबामा :- गनीमत है की हमारे काम नही मिलते है
ओसामा :- बात क्या है , अमेरिका के रस्त्रियापति बनते है तुम काफिरों की जुबान बोलने लगे हो
ओबामा :- काफिर कम से कम इंसान तो होते है तुम्हारी तरह बारूद तो नही उगलते है
ओसामा :- यानी हमारी दुसमनी चलती रहेगी, इंडिया की तरह किसी दलित अशेवेत के गद्दी पर बैठते ही तुम गोरे वामन जैसे क्यूं हो रहे हो ,
ओबामा :- किसी इंडियन श्लोक मैं कहा गया है की , " हम काले है तो क्या हुआ दिलवाले है, आगे ये है की हम तेरे तेरे चाहने वाले है,
ओसामा:- ये तेरे तेरे तेरे क्या है
ओबामा:- पवन पुत्र हनुमान
ओसामा :- लाहोल बिला कुवत
ओबामा :- क्या हुआ रावन
ओसामा :- खामोश रहो , खामोश रहो, सुना है की तुम अपने ऑफिस मैं गाँधी जी की तस्वीर रखते हो , शर्म नही आती,
ओबामा ;- कुछ दिनों तक तस्वीर तुम भी लटका लो बिरादर, तुम्हे भी आने लगेगी
ओसामा:- क्या?
ओबामा:- शर्म और क्या? कुछ दिनों दहशत गर्दी से परहेज करके तो दिखो
ओसामा:- तब तो मैं हिंदुस्तान का सर्व्यदैया कार्यकर्ता लगने लगूंगा ऐसी ज़िन्दगी से तो मौत आच्छी , जब तक अमेरिका की दूसरी ईमारत ना गिरा दूँ, तब तक आराम हराम है अमां तुम तो बुश के भाई निकले भारत से तो तुमने हनुमान और गाँधी के लिए हमसे और पकिस्तान से क्या लोगे
ओबामा :- तुम दोनों से तुम्हारा आतंक हीन लूँगा
ओसामा :- फ़िर हम दोनों करंगे क्या ?
ओबामा:- हनुमान चालीसा पढ़ना
ओसामा:- ज्यादा हनुमान, हनुमान मत करो तुम्हारे हनुमान ने भी लंका में बलवा मचाया था की नहीं आगजनी की थी की नहीं वोह बजरंग बली है की बजरंग दली ?
ओबामा:- सोर बजरंगी बदरंगी नहीं है एक कविता सुनो
ओसामा:- अब ज्यादा अटल बिहारी बाजपयी मत बनो अपने यहाँ भी आर्थिक मंदी को समझाओ-बुझाओ वो नई घोडी की तरह सबको लतिया रही है उसके कारन हमें एक दो की जगह दर्जन-२ धमाके करने पड़ रहे है नंगो के बैंक लूट रहे है कशमीर मसले पर बैठ कर हिंदुस्तान और पकिस्तान के साथ चौधराहट करो भला वो बन्दर क्या बन्दर जो बन्दर बाँट न करे तन तो काला है मन भी काला करो अमेरिका कहीं के
ओबामा :- तुम कभी नहीं सुधरोगे आधे मुशर्रफ़ कहीं के मैं तुझ रंगभेद-नस्लभेद की तरह मिटा दूँगा बिरादर
ओसामा:- आतंक की कोई नस्ल नहीं होती कहा भी गया है किसी इंडियन श्लोक में
ओबामा:- क्या कहा गया है ?
ओसामा:- यही की मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे.......वगैरा-वगैरा

Thursday, 16 October 2008

भारतीय योग शास्‍त्र

योग शब्द का अर्थ है जुडना, यदि इस शब्द को आध्यात्मिक अर्थ मे लेते है तो इस का तात्पर्य आत्मा का परमात्मा से मिलन और दोनो का एकाग्र हो जाना है। भक्त का भगवान से, मानव का ईश्वर से, व्यष्टि का समष्टि से, पिण्ड का ब्रह्मण्ड से मिलन को ही योग कहा गया है, हकीकत मे देखा जाए तो यौगिक क्रियाओ का उद्देश्य मन को पूर्ण रुप से प्रभु के चरणो मे समर्पित कर देना है । ईश्वर अपने आप मे अविनाशी और परम शक्तिशाली है। जब मानव उस के चरणो मे एकलय हो जात है तो उसे असीम सिद्धि दाता से कुछ अंश प्राप्त हो जाता है, उसी को योग कहते हैं।
चित वृतियों पर नियंत्रण और उस का विरोध ही दर्शन शास्त्र में योग शब्द से विभूषित हुआ है। जब ऎसा हो जाता है और ऎसा होने पर उस व्यक्ति को भूत और भविष्य आंकने मे किसी प्रकार की कोई परेशानी नही होती, वह अपने संकेत से ब्रह्मण्ड को चलायमान कर सकता है।
भारतीय योग शास्त्र मे इसके पांच भेद बताए गए हैं-
हठ योग
ध्यान योग
कर्म योग
भक्ति योग
ज्ञान योग
मूलत: मनुष्य मे पांच मुख्य शक्तियां होती है उन शक्तियों के अधार पर ही योग के उपर लिखे भेद या विभाजन संभव हो सका है। प्राण शक्ति का हठ योग से, मन शक्ति का ध्यान योग से, क्रिया शक्ति का कर्म योग से, भावना शक्ति का भक्ति योग से, बुद्धि शक्ति का ज्ञान योग से पूर्णत: सम्बन्ध है । वर्तमान काल मे इस विष्य पर जो ग्रन्थ प्राप्त होते है उन मे हठ योग प्रदीपिका, योग दर्शन, गोरख संहिता, हठ योग सार, तथा कुण्ड्क योग प्रसिद्ध हैं। पतांजलि का योग दर्शन इस सम्बन्ध मे प्रमाणिक ग्रन्थ माना गया है।
महार्षि पतांजलि ने चित की वृतियों का विरोध योग के माध्यम से बताया है और उनके अनुसार योग के आठ अंग हैं, जो कि निम्नलिखित हैं
१ यम २ नियम ३ आसन ४ प्रणाय़ाम ५ प्रत्याहार ६ धारणा ७ ध्यान
८ और समाधि

ऊपर जो आठ अंग बताए गए हैं उनमे से प्रथम पांच अंग बाहरी तथा अन्तिम तीन अंग भीतरी या मानसी कहे गए हैं।
यम:- अहिंसा, सत्य,अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह का व्रत पालन ही 'यम' कहा जाता है।
नियम:- स्वाध्याय, सन्तोष, तप, पवित्रता, और ईश्वर के प्रति चिन्तन को नियम कहा जाता है।
आसन:- सुविधापूर्वक एक चित और स्थिर होकर बैठने को आसन कहा जात है।
प्राणायाम:- श्‍वास और नि:श्‍वास की गति को नियंत्रण कर रोकने व निकालने की क्रिया को प्राणायाम कहा जाता है।
प्रत्याहार:- इन्द्रियों को अपने भौतिक विषयों से हटाकर चित मे रम जाने की क्रिया को प्रत्याहार कहा जाता है।
जब यह पांच कर्त्तव्य सिद्ध हो जातें हैं या इनमे से जब कोई साधक पूर्णता प्राप्त कर लेता है तभी उसे योग के आगे की क्रियायों मे प्रवेश की अनुमति दी जाती है। प्रत्येक साधक को चाहिए कि वह बाह्य अभ्यासों को सिद्ध करने के बाद ही आगे के तीन अभ्यासों मे प्रवेश करें तभी उसे आगे के जीवन मे पूर्णता प्राप्त हो सकती है।
धारण:- चित्त को किसी एक विचार मे बांध लेने की क्रिया को धारण या धारणा कहा जाता है।
ध्यान:- जिस वस्तु को चित मे बांधा जाता है उस मे इस प्रकार से लगा दें कि बाह्य प्रभाव होने पर भी वह वहां से अन्यत्र न हट सके, उसे ध्यान कहते है।
समाधी:- ध्येय वस्तु के ध्यान मे जब साधक पूरी तरह से डूब जाता है और उसे अपने अस्तित्व का ज्ञान नही रहता है तो उसे समाधी कहा जाता है।

Saturday, 20 September 2008

शिक्षक और शिष्य

शिक्षक और शिष्य

हमारे समस्त धार्मिक ग्रन्थ यह बात बताते है की शिक्षक और शिष्य का सम्बन्ध पिता और पुत्र से भी बढ़ कर है क्योंकि पिता ने तो मुझे ये अमूल्य शरीर प्रदान किया है परन्तु शिक्षक ने जीवन मे आगे बढ़ने के लिए सदेव प्रयास किया है, शिक्षक निर्माण कर रास्ता बताता है, शिष्य का भी ये कर्त्तव्य है की अपने शिक्षक को सब से ऊपर रखे और पुरा सम्मान दे
आज की हालात में शिक्षा का इस्टर अत्यंत ही नीचे चला गया है , आज शिक्षक और शिष्य के बीच मे गहरी खाई बन गई है, आज का छात्र आपने शिक्षको के प्रति आदर भावः नही रखता है, उसके काम आशोभानिये हो रहे है , आज का छात्र अपने शिक्षक के साथ अभ्रद व्यवहार करने में, उसे नीचा दिखाने, अजीब गरीब सवालो को करने से जरा भी नही हिच्कचाता है तो क्या इस पूरे समस्या के जिमेदार छात्र ही है आज के शिक्षक की मानसिकता भी बदल चुकी है, ये शिक्षक जिस तरह से छात्रो के साथ बर्ताव करते है,छात्र भी उसी प्रकार से पेश आते है, यदि कोई छात्र आर्थिक समस्या के कारन किसी शिक्षक से टूशन नही पढ़ पता है तो उसे शिक्षक के क्रोध का सामना करना पड़ता है,जिसके प्रतिक्रिया में शिष्य ऐसी हरकते करता है, इस समस्या के अतिरिक्त और भी कारन है जिस के कारन शिक्षक और शिष्य के बीच सम्बन्ध ख़राब हो रहे है,
परन्तु मैं तो इस छोटे से लेख के मधियम से अपने छात्र दोस्तों से यही कहूँगा की हमे परस्थितियों को अपने अनुकूल बनते हुए किसी भी तरह की कोई भी ग़लत कार्य नही करना चाहिए जिससे हमारे और शिक्षक के मधीय कोई बैमानी समस्या आए, और शिक्षको को भी अपनी मानसिकता बदलनी होगी और ज्यादा से ज्यादा अपने शिष्यों की सहियता करनी चहिये , तभी वे पूरे सम्मान के काबिल हो पाएँगे

Saturday, 30 August 2008

आज के नेताओ की गाथा

" देश न इसका , देश न उसका,
देश हमारे बाप का,
जितना चाहूँ उतना खाउओं,
क्या जाता आपके बाप का "

मेरे घर में छापा डाले, किसकी ये औकात है,
कोतवाल ही ताऊ मेरा, इस्पेक्टर हमारा है
मेरे दो दो मुह है भइया, एक नर का और एक सांप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का

मेरे पुरखे जेल गए थे, मैं भी गया तो क्या बुरा किया,
वो आज़ादी लेकर निकले, मैंने उसको डुबो दिया

मैं नेताओं का नेता हूँ, कोई न मेरी नाप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का
मेरे घपलों के रिकॉर्ड को कोई तोड़ न पाया है,
घपले बाज़ी में ही भारत को गोल्ड मैडल दिलवाया है,

मैं छोटा खेल न खेलों, खेल खेलता मैं टॉप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का
बाचे आपके पार ला दूँ, चिंता उतनी यार है,
बार बार नही मरना मुझ को मरना तो एक बार है,

देखा जाएगा , जब घडा भरेगा मेरे पाप का,
जितना चाहूँ उतना खाओ, क्या जाता है आप का

देश न इसका , देश न उसका,
देश हमारे बाप का,
जितना चाहूँ उतना खाउओं,
क्या जाता आपके बाप का


आधुनिक बाप

आधुनिक बाप
एक बच्चे को मिटटी खाता देख ,
मैंने उसके पिताजी से कहा
भाई साहब आप का बेटा मिटटी खा रहा है,
बाचे का बाप ऐठ कर बोला ,
खाने दे तेरे बाप का क्या जा रहा है,
अगर मेरा बेटा मिटटी खा रहा है,
ये तो अपना भविष्य बना रहा है,
हम इसे पढ़एंगे,लिखानेगे ,
बहुत बड़ा सिविल इंजिनियर बनाएँगे ,
फ़िर देखना ये अपना चमत्कार दिखेगा ,
हजारो कुंतल लोहा सरिया, सीमेंट ,
आराम से खा जाएगा
डकार भी नही लेगा, लाखो में खेलेगा ,
मान लो ये करम जला,
ठीक से पढ़ लिख नही पाया,
तो नेता तो बन ही जाइएगा,
फ़िर तो और मज़ा आएयेगा ,
आज मिटटी खा रहा है,
कल पुरा देश ही खा जाइएगा।

Tuesday, 12 August 2008

रक्षा-बंधन

सम्पूर्ण भारत वर्ष में हिन्दुओ के प्रमुख त्यौहारों में रक्षा बंधन का स्थान अहम् है रक्षा बंधन दो शब्दों से मिल कर बना है, रक्षा + बंधन ,जिसका शाब्दिक अर्थ है रक्षा बंधन होता है पर यदि हम गहराई में सोचे तो हमे मिलेगा की एक बहन के द्वारा भाई की सम्पूर्ण भाविष्य हेतु की गई कामना है असीम प्यार से कलाई पर बंधे गए धागों को रक्षा बंधन की संज्ञा देते है,इस बंधन के द्वारा एक बहन अपने भाई को ज़िन्दगी भर के लिए अटूट प्रेम एवं विश्वास के दायरे में रख देती है , ये अटूट कच्चे धागों का प्यार भाई के सुखमय जीवन हेतु की गई कामना को भी दर्शाता ही है साथ ही साथ भाई के कर्तव्य को भी इंगित करता है एक भाई का ये नेतेक परम कर्तव्य बन जाता है की जीते जी उसकी बहन को को परेशानी न हो और जितना हो सके उतना प्यार दुलार वो अपनी बहन पर लुटाए एक बहन भाई की कलाई पर कच्चे धागे की डोरी बंधाते हुए मन ही मन जो कामनाए करती है उसको हम इस सवैये के मधियम से व्यक्त कर रहा हूँ,

" प्रेम हमारा बना रहे, हर भाई के राग-राग में जग में वो न्याय प्रतिष्ठा पावे,
दुःख दर्द से दूर रहे मेरा भाई, दही माखन दूध का भोग उडावे ,
कीर्ति आनंद का रतन मेले , होके स्वतंत वह,
जग में सफलता के धवजा फेहेरावे ,
दीपक की सी लो लेकर वह , जग में नाम कमावे ,
दिन दुखी की सेवा करके , अबला वन की लाज बचावे "

इतना ही नही एक भाई अपनी बहन के बारे में बहुत ही अच्छे -अच्छे विचारो को सोचता है, राखी बंधने के समय जिस तरह की अभिलाषा इच्छाएँ एक भाई के मन में अपनी बहन के प्रति होती है उनको चंद पंक्तियों में मधियम से व्यक्त किया जा रहा है-
"अम्बर में जितने तारे हो,
जीवन में उतनी बहारें हो
धरती पर जितना उपवन हो,
वो सारे सुमन तुम्हारे हो,
सजी रहे खुशियों की महफिल ,
सदा रहो खुशाल ,
सलामत रहे प्रभु बहन हमारी
वो जिए हजारो साल "

स्वधेनता दिवस

"स्वर से अपने कबर तुम्हारी खुदा रहा हूँ , खुदा कसम मैं,
किया है तुमने जो जुल्म हम पर सुना रहा हूँ, खुदा कसम मैं,"
अंग्रेजो की २०० वर्षो की जालिम हरकतों ने भारतियों को कैदें - बा -मुसक्कत रखते हुए नींदे हराम कर दी मगर उन्हें नही पता था की भारत माँ की कोख से जन्म लेने वाले, उनकी गोलियों से उनको ही मार कर उन्हें इस देश और मुल्क से बेपन्हा कर देंगे,१५ अगस्त १९४७ का वो स्वर्णिम दिन अपनेआप में ही अतीत का नज़ारा हमारी आँखों के सामने ला देता है , इस आज़ादी को प्राप्त करने के लिए हमारे अमर सपूतो ने कोई कसर बाकि नही रखी और न ही हमारी माँ बहनों के दिलो दिमाग पर इस चीज़ का जरा सा भी भय आया की उनके मांगो का सिंदूर बिखर जाइएगा, अतीत कर दर्द भरे दिनों को याद करते हुए मिर्जा ग़ालिब कर यह शेर जुबा पैर आ जाता है-
"शहीदों की चिताओ पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालो कर यही बाकि निशा होगा"
१८५७ के प्रथम स्वतंत्र संग्राम से लेकर १९४७ के भीषण रक्त पात एवं नर संहार की कहानी हमारे देश के प्रतेयक युवा वर्ग की नसों में बह रहे रक्त में एक अजब सा जोश ला देती है इस आज़ादी को हमे बरकरार रखना होगा उन वीर सपूतो के अरमानो तथा उनके द्वारा किए गए सतत प्रयासों पैर हमे अपनी द्रष्टि डाल कर अपने अंदर भी आस, हिमत और होसलो कर एक चिराग जलाए रखना होगा और हमें किसी भी कीमत पर अपनी आज़ादी की हसरतो को बरकरार रखना होगा

"अपनी आज़ादी को हम हार्गिज मिटा सकते नही,
सर कटा सकते है लेकिन सर झुका सकते नही "
हमारे वीर सपूतो की आशाओ , दृढ निश्चय
एवं सकारात्मक प्रयास जोर जोर की आवाजो से हमे आगाह कर रहे है , उनके पक्के इरादों में भी सफलता की चिंगारी देखने को मिलती थी

"हमारी आहो जारी से यह शाही रह न जायेगी , उन्ही की गोलिया उनको जहनुम भी दिखाएंगी ,
अगर हम आज मरते है तो कल तुम भी यह देखोगे , उन जालिमो की हस्ती भी यहाँ पर न रह पायेगी "

उन अमर शाहिदो पर हमें नाज़ होने चहिये जिनका नजरिया कुछ इस तरह था

"मैं स्वतंत्रता कर पागल प्रेमी मुझे जा की परवाह नही ,
शूलो से मेरा नाता है फूलो की मुझे चाह नही,
मरने पर भी ,स्थान पर लिखा मिलेगा स्वतंत्रता ,
लपटों में संदेश क्रांति की, देनी होगी मेरी लाल चिता"

Thursday, 22 May 2008

व्यापार में सफलता का रहस्य

प्रतिस्पर्धा के इस युग मे आपको कई तरह के उत्पाद व सेवाएँ बेचना होता है व उन्हे बेचना सिखाया भी जाता है। इन सभी तकनीकों, योजनाओं से परे कुछ ऐसे तथ्य हैं जो आपके उत्पाद या सेवाओं को बाज़ार तक लाने मे सहायक हो सकते है। इन सुझावो से आपकी मार्किटिंग गतिविधियों में बदलाव आएगा और आप बेहतर नतीजे पाएगें।

आपका उत्पाद या सेवा कोई भी क्यो न हो, सफलता पाने के लिए पूरी निष्‍ठा,व वचनबद्धता के साथ मार्किटिंग से जुडी प्रकिया निभानी होगी। आपने ग्राहको को सेवाओं की सक्षमता व गुणवता का एहसास दिलातें रहें ताकि वे निश्‍चिंत होकर आप पर निर्भर हो सकें। ऐसा इसलिए करना भी ज़रुरी है क्योकि दिखाई न देने वाला दिमाग से भी निकल जाता है प्रतिदिन आपकी सेवाओ की गुणवता से जुडे संदेश व वाक्य बाज़ार मे जाने चाहिए। यह कार्य लगातार होना चाहिए। अधिकतर ग्राहको के पास जानकारी का कोई दुसरा स्त्रोत नही होता। वे आप से ही आप के बारे मे जानना चाहते है। एक सावधानी, सेवा की गुणवत्ता, विज्ञापन का विकल्प नही है। विज्ञापन मे सेवा या उत्पाद के श्रेष्ठ बिंदुओ पर बल दिया जाना चाहिए जो कि जांच होने पर भी खरा उतरे। एक अच्छा उत्पाद, मार्किटिंग के साथ अपने क्षेत्र मे काफी ऊँचा उठ सकता है।

बेहतर व अच्छी सेवाएँ उपलब्द कराने के साथ-साथ उन की अच्छी मार्केटिगं होनी भी ज़रुरी है। विज्ञापन, मैगज़ीन, न्युज़ लैटर, व ब्रोशर आदि जो उत्पाद की जानकारी दें, उन्हे भी ऊची क्‍वालिटी का होना चाहिए। यदि चित्र अच्छे नही हुए तो इस से भी बुरा प्रभाव पडता है। यदि लेखन अच्छा होगा तो पाठक उसकी ओर आकर्षित होगा और उसे पढेगा। इसके विपरीत घटिया कागज़, घटिया लिखाई आप के व्यवसाय को नुकसान पहुँचा सकता है लोग इसे पढना भी पसंद नही करेगे और ऐसा कागज़ सीधे कूडे की टोकरी मे जा सकते है।

तेज़ी से होते तकनीकी सुधार, विकास व विस्तार ने उद्यमियो को सोचने पर विवश कर दिया है कि प्रमोशन, कैपेंन उनकी सफलता के लिए फायदेमंद हो सकता है । दीर्घकालिन मार्केटिंग के बल पर वे अपने ग्राहको को विश्‍वास दिलाने मे कामयाब होते है की उनका उत्पाद ही क्‍वालिटी मे सबसे उत्तम है। सफलता अचानक नही मिलती। यह बहुत दबे पांव आपके पास आती है।

नए व आधुनिक डिज़ाइनो के अत्पाद तेज़ी से बाज़ार मे आ रहे है। इस के लिए ज़रुरी है कि आप भी अपने नीतियों मे बदलाव लाएँ और यही न करते रहें, "हम तो इस काम को इसी तरीके से करते आ रहे है और ऐसा ही करेगे"।

ग्राहको के विचार व ज़रुरते भी लगातार बदलते है। इसलिए ज़रुरी नही कि पिछले वर्ष वाली नीति, इस वर्ष भी आपके काम आएगी। आपको सबसे पहले उपभोक्ता की मांग पर ध्यान देना चाहिए जो पिछले वर्ष से अलग हो सकती है। मार्केटिंग के क्षेत्र मे कोई फिट फार्मूला नही चलता। आपको धारा के अनुकूल आपना जहाज चलाना होगा।

सदा एक ही नीति काम करेगी, ऐसा मानने की मूर्खता न करें। याद रखें कि कितने ही लोग आपका स्थान लेने को तैयार बैठे हैं। आपकी ज़रा सी लापरवाही उन्हे उँचा उठने का अवसर दे सकती है। एक बात सच है कि आपके नीति बाज़ार में चल पडी तो शीघ्र ही प्रतिस्पर्धी भी उस की नकल कर लेंगे। आपको अपने स्थिति पर बने रहने के लिए और भी कडी मेहनत करनी होगी।

कडे परिश्रम का कोई विकल्प नही होता। थाँमस जैफरलन इस विष्य मे कहते है " मैने पाया कि मै जितना मेहनत कर रहा था, भाग्य मेरे उतने ही करीब आ रहा था"।

Monday, 5 May 2008

बजट २००८- एक सच्चाई

हर साल की तरह इस साल भी आम बजट आया। इस साल के बजट को सूंघते ही आगामी चुनाव की खुशबू आने लगती है क्योंकि इस साल जब वितीयमंत्री पी चिताम्बरम ने आपने चमड़े के थैले से जब बजट निकला तो यह बात अपने आप सामने आ गई की चुनाव नजदीक है। किसानों के लिए ६० हज़ार करोड़ रुपये का कर्ज माफ़ हुआ, व्यापारी वर्ग के लिए आयकर मई भारी छुट दी गई है, पहेले यह सब कुछ उस बदलाव का हिस्सा लगा जिस की अब कुछ कम ही गुंजाईश लगती है। और सरकार को जिस महंगाई की तरफ नजर उठानी चाहिए उसकी तरफ वह पीठ किए हुए है। आज भी देश की अधिकांश जनता के पास उसकी मूलभूत जरूरते पुरा करने के साधन नही है। इसे मे केन्द्र सरकार द्वारा पेश किया गया लाखो करोडो का बजट किस काम का है। चपरासी से लेकर ऊँचे आधिकारी तक हर जगह ऐसे लोग बैठे हुए है जो की इस आस मे रहेते है की पैसा कैसे वसूल किया जाए और फ़िर हड़प जाए, दिल्ली से चला १०० रुपये का नोट आम आदमी तक पहुँचते - २ १० का नोट बन जाता है, यह जादूगरी भ्रस्ताचार के उपासक करके दिखाते है, चिताम्बरम कुछ भी बोले किंतु यह बजट हो या इस से भी अच्छा बजट , आम जनता की माली हालत मे कभी भी कोई सुधार नही होने वाला है, बजट मे खर्च हुआ करोडो रुपये सरकारी विभाग मे ही खो कर रह जाता है, आम आदमी के हिस्से मे सिर्फ़ और सिर्फ़ झूठन ही आती है, मीडिया जो आम आदमी की आवाज़ पहुँचा सकती है उसके पास ग्लामौर, सलेबृति और हिंसा के आलावा किसी और काम के लिए फुरसत ही नही है ( शायद पार्ट टाइम मे न्यूज़ चेन्नालो ने विवाह शादी की वीडियो ग्राफी का काम शुरू कर दिया है, )

देश के संपन वर्ग को आम बजट से कोई फर्क नही पड़ता है लेकिन उस ८० करोड़ जनता का क्या होगा जिनकी बात कोई नही सुनता है।

Thursday, 1 May 2008

मैनेजमेंट एजुकेशन का बढ़ रहा है क्रेज

युवाओं के बीच मैनेजमेंट एजुकेशन का क्रेज पिछले कुछ वर्षो में तेजी से बढा है। सबकी यही कोशिश होती है कि इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ मैनेजमेंट (आईआईएम) से एमबीए करने का अवसर मिले। लेकिन आज देश में ऐसे अनेक संस्थानों ने अपनी परफॉर्मेस से अच्छी-खासी प्रतिष्ठा हासिल कर ली है, जहां के ग्रेजुएट्स को कॉर्पोरेट सेक्टर मुंहमांगी सैलॅरी दे रहा है। ऐसे संस्थानों में दिल्ली एनसीआर के गाजियाबाद में स्थित इंस्टीटयूट ऑफ मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी (आईएमटी) को टॉप बिजनेस स्कूलों में शुमार किया जाता है। आईएमटी का एक प्रमुख सेंटर नागपुर में भी है। खास बात यह है कि आईएमटी ने दुबई में भी अपना अब्रॉड सेंटर स्थापित किया है। मैनेजमेंट एजुकेशन के बढते क्रेज और संस्थानों के चयन के बारे में पिछले दिनों आईएमटी की ज्वॉइंट एडमिशन कमिटी के चेयरमैन डॉ. अरुण मोहन शेरी से खास बातचीत की गई। पेश हैं इसके मुख्य अंश..

इन दिनों मैनेजमेंट एजुकेशन का क्रेज क्यों इतनी तेजी से बढता जा रहा है?

देखिए, पिछले कुछ वर्षो के भीतर भारतीय कॉर्पोरेट ने दुनिया में अपनी एक नई पहचान बनाई है। इंडिया इस समय ग्लोबल मैप पर है। इकोनॉमिक ग्रोथ यहां की प्रतिभाओं की मेहनत के चलते पूरे विश्व में भारत को मान्यता मिल रही है। भारतीय कार्पोरेट जगत के प्रोफेशनल्स की छवि ग्लोबल हो गई है। यह सब संभव हो सका है सरकार के लिबरलाइजेशन और कंपनियों की अपनी पहल के चलते। भारतीय आईटी कंपनियों के बाद देश की अन्य तमाम अब विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का अधिग्रहण करने लगी हैं। साथ ही, भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और यहां के विशाल बाजार को देखते हुए दुनिया भर की कंपनियां यहां अपने पैर जमा रही हैं। इन सभी को देखते हुए सभी देसी-विदेशी कंपनियों में मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स की मांग तेजी से बढ रही है। प्रतिष्ठित बिजनेस स्कूलों से मैनेजमेंट कोर्स करने वाले युवाओं का अच्छी कंपनियों में कैम्पस सिलेक्शन हो जाता है, और वह भी करीब 12 लाख से लेकर 36 लाख रुपये वार्षिक सैलॅरी पैकेज पर। कंपनियों की लगातार बढती संख्या को देखते हुए जिस तरह मैनेजमेंट प्रोफेशनल्स की मांग बढ रही है, उसे देखते हुए युवाओं में इसका क्रेज बढना स्वाभाविक है। मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स की बढती मांग को देखते हुए पिछले कुछ वर्षो से आईआईटी करने वाले युवा भी अब बीटेक करने के तुरंत बाद जॉब करने की बजाय मैनेजमेंट कोर्स अधिक पसंद करते हैं। इसके बाद ही वे नौकरी करना चाहते हैं। दरअसल, इससे जॉब मार्केट में उनकी वैल्यू और बढ जाती है।

कॉर्पोरेट सेक्टर और खासकर मल्टीनेशनल कंपनियों द्वारा भारतीय मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स को पसंद करने का कारण आपको क्या लगता है?

मुझे इसके कई कारण नजर आते हैं, जिनकी बदौलत देश और दुनिया की प्राय: सभी कंपनियां भारतीय मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स को पसंद करती हैं और नियुक्ति में उन्हें प्राथमिकता देती हैं। इसका सबसे बडा कारण भारतीय युवाओं का खूब मेहनती होना है। उन्हें जो टार्गेट दिया जाता है, वे जब तक उसे हासिल नहीं कर लेते, तब तक चैन नहीं लेते। अमेरिका आदि में जो काम ओवर टाइम और काफी अधिक पैसे खर्च करके कराए जाते हैं, वही काम भारतीय युवा निर्धारित समय के भीतर और बेहद कम खर्च में अपेक्षाकृत अच्छी क्वालिटी के साथ करते हैं। इसे उनकी यूएसपी माना जाना चाहिए, जिससे दुनिया में पूरे भारत की अच्छी छवि बनती है।

मैनेजमेंट एजुकेशन की दिशा में पहला कदम क्या होना चाहिए?

यदि किसी युवा को मैनेजमेंट कोर्स करना है, तो सबसे पहले उसे किसी भी स्ट्रीम में अच्छे अंकों से ग्रेजुएशन करना होगा। इसके बाद उसे यह तय करना होगा कि उसे मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (एमबीए) या पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (पीजीडीबीएम) में से कौन-सा कोर्स करना है। देश में किसी भी प्रतिष्ठित बिजनेस स्कूल में प्रवेश के लिए एंट्रेंस एग्जामिनेशन देना होता है। इसे क्लीयर करने के लिए अच्छी तैयारी करनी होती है।

मैनेजमेंट एजुकेशन के क्षेत्र में किस-किस तरह के संस्थान संचालित हैं?

देश में मैनेजमेंट एजुकेशन के क्षेत्र में सरकारी स्वायत्त संस्थान आईआईएम (अहमदाबाद, बेंगलुरु, लखनऊ, मुंबई, इंदौर व कोझिकोड) के अलावा राज्य सरकारों और निजी क्षेत्र द्वारा संचालित असंख्य संस्थान हैं। इनमें से आईआईएम तथा कुछ निजी बिजनेस स्कूलों को विशेष ख्याति प्राप्त है।

प्रमुख बिजनेस स्कूलों में प्रवेश के लिए आमतौर पर कौन-कौन से एंट्रेस टेस्ट आयोजित किए जाते हैं?

आईआईएम तथा इसके समकक्ष मैनेजमेंट संस्थानों में प्रवेश के लिए आल इंडिया लेवॅल पर कैट (ष्टन्ञ्ज) का आयोजन किया जाता है। इसके अतिरिक्त आईमा द्वारा मैट, एक्सएलआरआई-जमशेदपुर द्वारा एक्सएटी, एफएमएस, इंदिरा गांधी नेशनल ओपेन यूनिवर्सिटी द्वारा ओपेनमैट आदि का आयोजन किया जाता है।

कैट और अन्य एंट्रेंस में सामान्यतया किन-किन क्षेत्रों से प्रश्न पूछे जाते हैं?

इस तरह की प्रवेश परीक्षाओं में कई क्षेत्रों से प्रश्न पूछे जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं : क्वांटिटेटिव एप्टीटयूड, रीडिंग कॉम्प्रिहेंशन, वर्बल एबिलिटी, डाटा एंटरप्रिटेशन, रीजनिंग, डाटा सफिंशिएंसी आदि। अन्य परीक्षाओं (जैसे-मैट) में मैथमेटिकल स्किल तथा इंडियन और ग्लोबल एनवॉयरमेंट से जुडी जानकारी की परीक्षा भी ली जाती है।

मैनेजमेंट एजुकेशन के लिए संस्थान का चयन करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

किसी भी स्टूडेंट को बी-स्कूल का चयन करते समय संस्थान की बिल्डिंग या बाहरी चमक-दमक पर कतई नहीं जाना चाहिए। मैनेजमेंट एजुकेशन में इमारत बिल्कुल महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण होता है-फैकल्टी प्रोफाइल। संस्थान की इनटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ही उसकी पहचान होती है। इसलिए किसी भी संस्थान में एडमिशन लेने से पहले यह देखना चाहिए कि वहां की फैकल्टी कितनी अच्छी है, संस्थान के प्रमोटर कौन हैं, उनका विजन कैसा है, अलमुनि बेस कैसा रहा है, अलमुनि को मार्केट में कैसा रिस्पॉन्स मिला है, इंडस्ट्री उस संस्थान के ग्रेजुएट्स को किस तरह देखती है। इन सबके अलावा यह भी देखना चाहिए कि वह संस्थान उस देश के सरकारी निकाय द्वारा मान्यता प्राप्त है या नहीं। इसके बाद उस संस्थान की प्रतिष्ठा देखनी चाहिए। प्रतिष्ठा की जांच दो स्तरों पर की जानी चाहिए-एक तो, वहां की पढाई का स्तर और फैकल्टी कैसी है और दूसरा, वहां के प्लेसमेंट की क्या स्थिति है। इसके लिए उस संस्थान पहले पढ चुके स्टूडेंट की राय जानने की कोशिश करनी चाहिए।

आईएमटी जैसे संस्थान फुलटाइम के साथ-साथ डिस्टेंस लर्निग से मैनेजमेंट करा रहे हैं। इसका क्या कॉन्सेप्ट है?

दरअसल, यह कोर्स खासकर वर्किग एग्जीक्यूटिव्स के लिए है, जिनके पास फुलटाइम कोर्स करने का समय नहीं है। लेकिन हमारे यहां के डिस्टेंस प्रोग्राम के तहत ऐसे लोग फुलटाइम जैसी सभी सुविधाओं के साथ कोर्स पूरा कर सकते हैं। एमबीए करने का उन्हें दो तरह से फायदा मिलता है, एक तो प्रमोशन मिल जाता है और दूसरे उनकी सैलॅरी में भी अच्छा-खासा इजाफा होता है। कॉर्पोरेट सेक्टर भी अपने एग्जीक्यूटिव्य को ऐसे कोर्स करने के लिए प्रेरित कर रहा है। आईएमटी में डिस्टेंस मोट में अब तक पांच हजार से अधिक इनरोलमेंट हो चुके हैं। खास बात यह है कि आईएमटी अपने स्टूडेंट्स को ऑनलाइन डिजिटल लाइब्रेरी सुविधा उपलब्ध कराने वाला पहला संस्थान है। इसका मेंबर बनकर कहीं भी रहकर इस सुविधा का लाभ उठाया जा सकता है। डिस्टेंस प्रोग्राम में भी फुलटाइम फैकल्टी है। कोर्स मैटीरियल में केस स्टडी और सेल्फ असेसमेंट भी होता है। नियमित रूप से पर्सनल कॉन्टैक्ट क्लासेज भी होते हैं।

मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स को सैलॅरी कैसी ऑफर की जा रही है?

सामान्यतया एक मैनेजमेंट ग्रेजुएट को शुरुआत में 7 से 12 लाख रुपये मासिक की सैलॅरी का ऑफर मिलता है। अपवाद के रूप में कुछ स्टूडेंट को फॉरेन प्लेसमेंट के तहत 1 करोड रुपये का ऑफर भी मिल जाता है।

पिछले कुछ समय से मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स द्वारा अपना उद्यम शुरू करने का ट्रेन्ड देखा जा रहा है। इसके पीछे क्या कारण है?

यह तो देश के लिए बहुत अच्छा संकेत है। इस तरह से उद्यम शुरू करके वह कई लोगों को रोजगार देता है और देश की आर्थिक उन्नति में भागीदार बनता है। इसे अधिक से अधिक बढावा दिया जाना चाहिए।

Monday, 14 April 2008

दुनियां के सबसे सुन्दर बच्‍चे

एक बार एक मादा उल्लू के अहसान का बदला चुकाने के लिए एक गरुड ने उससे वायदा किया कि वह उस उल्लू के बच्‍चों को कभी नुकसान नही पहुँचाएगा । पर तुम मेरे बच्‍चों को कैसे पहचानोगे? मादा उल्लू ने बडी उत्सुकता से पूछा, यह कैसे पता चले कि तुम उन्हे किसी अन्य चिडिया के बच्‍चे नही समझ लोगे?

ऐसा करो कि तुम खुद ही बता दो वे कैसे दिखते हैं, गरुड ने पूछा?

वास्तव मे वे किसी अन्य चिडिया के बच्‍चे जैसे नही है, मादा उल्लू ने गर्व से सीना फुला कर कहा। वे नरम है, गुदगुदे हैं और दुनियां के सब से सुन्दर बच्‍चे हैं। इतने सुन्दर बच्‍चे तुम ने कभी नही देखे होगे।

एक शाम गरुड को एक ऐसा घोंसला मिला जिसमे चिडिया के कुछ बच्‍चे चिल्ला रहे थे। उन के लाल मुँह खुले हुए थे। वह रुका और थोडी देर विचार करने के बाद वह खुद से बोला " ज़ाहिर है यह तो उस उल्लू के बच्‍चे नही हो सकते क्योकि मादा उल्लू ने तो कहा था कि उस के बच्‍चे बेहद खुबसुरत हैं और यह बच्‍चे तो बहुत बद्सूरत है" उस के बाद बिना कुछ सोचे वह उन बच्‍चों पर टूट पडा और सब को खा गया। वहां सबकुछ खून सने पंख पडे थे।

गरुड अपना वादा कैसे भूल गया? वह रोते-रोते बोली। मैने तो उसे बता दिया था कि मेरे बच्‍चे सब से सुन्दर है।

सबक; हर माँ यही समझती है कि उस के बच्‍चे सब से सुन्दर व अच्छे हैं ।

Monday, 7 April 2008

आया रखने से पूर्व बरतें कुछ सावधानियां

आजकल की महिलाएं नौकरीपेशा वाली हैं इसलिए ज्यादा समय घर से बाहर बिताती हैं संयुक्त परिवारों मे या जिन के माता पिता घर पर रह्ते है उन्हे बच्‍चों की देखबाल की समस्या नही होती है परन्तु एक्ल परिवारों मे मां के दफतर जाने के बाद बच्‍चे की देखबाल के लिए कोई नही रहता इसलिए महिलाएं अपने बच्‍चों के लिय आया का इंतजाम करती है। आया उनके अनुपस्थिति मे बच्‍चों की देखबाल करती है तथा उनके खानपान का ध्यान रखती है मगर हमेशा ऐसा नही होता कुछ आया मां की अनुपस्थिति मे अपना मनोरंजन करती है जबकि बच्‍चा बिलखता रह्ता है। ऐसे मे सावधान रहें हमेशा आया रखने से पूर्व कुछ बातों का ध्यान रखें।
जांच पड्ताल कर लें:
आया रखने से पहले उस की पूरी जांच पड्ताल कर लें। उस के विष्य मे पूरी जानकारी ले लें। उस का आता पता सब नोट करलें। जब तक आप को उस पर विश्‍वास न हो जाए तब तक बच्‍चे और घर को उस के भरोसे छोड कर न जाएं। वह साफ साफाई पर कितना ध्यान देती है यह भी परख लें । गंदी आया बच्‍चो को भी साफ सुथरा नही रखती, जब वह खिलाएगी तो बच्‍चा उससे चिपकेगा भी ऐसे मे बच्‍चे के बिमार होने की अशंका बढ जाती है। गंदी आया के साथ रखने से बच्‍चा बीमार रहने लगेगा।
बच्‍चों के खाने-पीने की तरफ ध्यान दें:
इस बात का खास ख्याल रखें कि आया आप के बच्‍चे के खाने-पीने का ध्यान रखती है या नही। बच्‍चे के हिस्से का खाना आदि वह स्वयं तो नही खा जाती यदि आप को शक हो तो उसके खाने पीने का इंतजाम करें। याद रखें आप उस का ख्याल रखेगे तो वह आप के बच्चे का ज्यादा ख्याल रखेगी। बेवजह उस पर शक न करें। इससे उस पर गलत असर पड्ता है।
आया को पूरे विश्‍वास मे लें:
उसे पूरा मान सम्मान दें। उसके साथ विनम्रता के साथ पेश आएं। आपके उनुपस्थिती मे वह आप के बच्‍चे के साथ रहती है यदि आप उसके साथ बदतमीजी करेगें तो वह आपके बच्‍चे के साथ बुरा बरताव कर सकती है, इसलिए उसे विश्‍वास मे लें । उसके साथ नरमी से पेश आएं। उस से उतना ही काम करवाएं जितना वह आराम से कर सके। उस पर काम का बोझ न लाद दें वरना वह आप के बच्‍चे पर उचित ध्यान नही दे पाएगी।
बच्‍चे को अकेले बाहर ले जाने की अनुमती न दें:
पूरी तरह से बेफिक्र होकर आप घर से बाहर न निकलें। आपके बच्‍चे के आया को अकेले छूट देना भी ठीक नही है उसे बच्‍चे को अकेले बाहर ले जाने की अनुमती न दें वरना बच्‍चा कही रोता फिरेगा ओर वह किसी के साथ गप्पें मारती रहेगी। कभी कभी द्फ्तर से जल्दी आकर यह देखें कि बह आपके बच्‍चे को किस तरह रखती है। इससे आया को भी लगेगा कि आप किसी भी वक्‍त आ सकती हैं । उसे अपनी मन मर्जी करने का मौका नही मिलेगा। घर के नौकरो के साथ व पुरुष सद्स्यों के साथ आया को अकेला छोडने की गलती कभी न करें। आया के सामने कीमती वस्तुओ, रुपए पैसे, गहने वगैरा रखने से बचें। उसके जाने के बाद ही रखें या निकालें।
नजदीकी रिशतेदारों आदि के फोन नम्बर जरुर दें:
यदि अपने नवजात शिशु या बच्‍चो को आया के भरोसे छोड कर जाना पडे तो तो रिशतेदारी की किसी बुजुर्ग महिला को बुलालें जो आप के बच्‍चे व आया पर नज़र रख सके।

Thursday, 3 April 2008

विल्क्षण बुद्धि (Amazing mind) के मालिक वीरेन्द्र मेहता

आप विश्‍वास करें या न करे परन्तु यह सच है कि विरेन्द्र मात्र 13 सैकिंड मे शब्दकोष का कोई भी शब्द बता सकते है। द्सवी कक्षा मे मात्र 33 % अंक लेने वाले वीरेन्द्र मेहता ने शायद यह कभी सोचा भी न होगा कि एक दिन आएगा जब वह महज़ 13 सैकिंड के भीतर शब्दकोष के किसी भी शव्द का अर्थ याद कर बता पाएगें। हरियाणा राज्य के रोहतक जिले के मस्तनाथ इंजीनियरिंग कालेज (engineering college) के यह 25 वर्षीय शिक्षक अपने स्कूली दिनो मे पढाई मे बहुत अच्‍छे नही थे मगर आज तो उन की कहानी कुछ अलग ही है।
मेहता अक्सर्फोड लरनर्स डिक्शनरी के किसी भी शब्द का अर्थ 13 सैकिंड के अन्दर बता सकते है और वह भी सही पेज नम्बर के साथ। उनके इस दावे की सचाई का पता लगाने के लिए जब उन से पूछा गया कि कल-डि-सैक शब्द किस पेज पर है तो उन्होने झट से बता दिया कि यह पेज नंबर 306 पर है।
अपनी इंजीनियरंग परिक्षा के दौरान ही महत्ता ने शब्द्कोष को रट्ने का मन बनाया. उन्होने बताया कि 80,000 से ज्यादा शब्द उनके अर्थो और पृष्ठ संख्या के साथ याद करने मे उन्हे 6-7 महिने का समय लगा. वह मानते है कि 10वी की कक्षा मे वह गणित और अंग्रेजी मे काफी कमजोर थे और उस के बाद ही उन्होने पढाई की और ध्यान देना शूरु किया. मेहत्ता के अनुसार अपनी सबसे बडी कमजोरी को ताकत मे बदला तथा अब तो उन्हे शब्द्कोष से मोहबत हो गई है.
मेहता शब्द्कोष को याद करने ने रोज़ाना 6-7 घंटे लगाते और साथ ही योग का अभ्यास भी करते थे. भगवान कृष्ण और स्वामी विवेकानंद मे विश्‍वास रखने वाले मेहता का ख्वाब उस समय पूरा हुआ जब लिम्का बुक्स आँफ रिकार्ड्स (Limka books of records) ने अपने 2006 के संस्करण मे उनकी सफलता को दज किया. जब कि इस से पहले यह रिकार्ड उनके कालेज के ही महावीर जैन के नाम था जो 16 सैकिंड मे शब्द्कोष के अर्थो को साथ बता सकते थे.
मेहता ने बताया कि उन्होने शब्द्कोष (dictionary) को याद करने के लिए फोटोग्राफिक कौन्सेप्ट का इस्तेमाल किया. फोटोग्राफिक मेमोरी (photographic memory) किसी व्यक्ति मे चीजो को स्पष्‍ट रुप से याद करने की क्षमता है जिससे उसके मन मे उस चीज की एक वास्तविक तस्वीर बन जाती है. महता का कहना है कि हमारी 5 ज्ञान इंद्रियां हैं उन मे से एक आखें कैमरे का काम करती है . अगर हम अधिक से अधिक इन का प्रयोग कर सकेगे तो जो भी आप याद करना चाहते है, कर सकेगे

Tuesday, 1 April 2008

धुम्रपान इस तरह छोडें

सिग्रेट पीने वाला हर आदमी चाहता है कि उसकी यह आदत छूट जाए फिर भी दुनियां के एक अरब से अधिक लोग इस बुरी आद्त के शिकार है। यह लोग अरबों की संख्या मे सिग्रेट और करोडों रुपये धुआं बना कर उडा देते हैं। विकासशील देशों की तुलना मे विकसित देशो मे इस लत के शिकार लोगों के संख्या अधिक है। इस के सेवन से होने वाले अपार नुकसान से हर धुम्रपान का आदी बखूबी वाकीफ है। फिर भी चूकि एक बार लत पड जाने के बाद इस को छोड पाना मुश्किल हो जाता है इसलिए वह इन्हे नजर अंदाज करके पी जाता है। तम्बाकू क सेबन सिग्रेट, बिडी, चिलम आदि और हुक्के के रुप मे जितना नुकसानदायक है, उतना ही हानिकारक पान और खैनी के रुप मे भी है। हर साल तम्बाकू के इअन विविध प्रयोगों से दुनियां भर के लगभग 30 लाख लोग काल के ग्रास बन जाते है। एक अध्ययन के अनुसार एक सिग्रेट मनुष्य का लगभग 8 मिनट उम्र कम कर देता है।

एक सिग्रेट मे लगभग 32 प्रकार के हानिकारक रासायन पाऐ जाते हैं। हालांकि यह सही हौ कि एक बार सिगरेट की आदत पड जाने के बाद इसे छोडना कठिन होता है परंतु अगर आप धुम्रपान सचमुच छोड्ना चाहती हैं तो वह काम केवल व केवल आप के द्धारा ही संभव है और आसान भी है, बशर्त आप के दिल मे ठोस निश्‍चय और खुद के प्रति ईमानदार हो। अगर आप नीचे लिखे बातों का पालन एक ब्रत के रुप में करें तो वह बुरी लत आसानी से छुट सकती है।

  1. मन मे ठोस निश्‍चय करके कोई एक दिन निश्‍चित कर लें कि फलां दिन से वीडी सिग्रेट नही पिऐगें।

  2. इस बात की सूचना आपने दोस्तों और घर-परिवार वालों को भी दें।

  3. निश्‍चित दिन से सिग्रेट वीडी की तरफ देखें तक नही, यहां तक कि उस दुकान की तरफ जहां से सिग्रेट वीडी खरीदतें हैं, तब तक न जाएं जब तक बह लत छूट न जाए।

  4. इस दौरान हलका एंव सुपाच्य भोजन से कुछ कम ही लें। पानी खूब व बार बार पिएं।

  5. गर्मी के दिनो मे दो-तीन बार स्‍नान भी कर सकते हैं।

  6. सिग्रेट वीडी पीने की जरुरत महसूस होने पर ठंडे पाने से मुँह धो कर लौंग इलाइची या कुछ खा कर किताबें आदि पढ्ने मे व्यस्त हो जाएं।

  7. यह कभी न सोचें कि अच्छा एक बार पी लें फिर नही पीएगें । इससे धोखा होगा।

  8. जितने पैसे आप सिग्रेट वीडी पर खर्च करते थे, उतने पैसे रोज अलग जगह पर रखते जाएं जिस की जानकारी घर के सदस्यों या जिस को आप कह सकें, को भी कह दें।

  9. इन पैसो से आप बीच बीच मे अपने माता-पिता या बीबी-बच्‍चों के लिए कोई सामान खरीद कर लाया करें, इस से आप को आत्मसंतुष्‍टी मिलेगी और परिवार भी खुशाल होगा।

  10. सिग्रेट वीडी पीने से खर्च होने वाला समय कुछ किताबे पढ्ने, जो आप को अच्छा लगे या किचन गार्ड्न बनाने मे बिताएं।

  11. इस तरह तब तक करते रहें जब तक पूर्ण रुप से आद्त छूट न जाए।

उपरोक्त बातो को अपने जीवन मे अपना कर आप सिग्रेट रुपी मीठे जहर से बच सकते हैं।

Monday, 31 March 2008

किशोरों के दिमाग को अधिक नुकसान पहुँचाती है शराब

अनुसंधान ने यह साबित कर दिया है के आलकोहल किशोरो के विकासोन्मुख दिमागों को आधिक नुकसान पहुँचाता है जबकि पूर्व विज्ञानिक का मत इसके विपरित था। नवीनतम शोध के अनुसार अलकोहल (alcohal) वयस्क दिमागों के अपेक्षा किशोरों के दिमाग को अधिक नुकसान पहुँचाता है।
इन खोजो मे इस धारणा को समाप्त कर दिया है कि कई साल तक भारी मात्रा मे अल्कोहल का इसतेमाल करने से ही स्‍नायु तंत्र गंभीर रुप से जख्मी होता है खोज यह बताती है कि शुरुआत मे भारी मात्रा मे अल्कोहल का प्रयोग आपको शराबखोर बनने से रोकने के लिए वाछित स्‍नायु तंत्र की क्षमता को कमज़ोर कर देता है।
इस संबंध मे किए गए अनुसंधान यह बताने मे मदद करेगें कि जो लोग किशोरावस्था में शराब पीना शूरु कर देते हैं उसमे शराबखोर बनने की यथावना बहुत अधिक रहती है।
आर्काइवस आँफ पैडिएट्रिकस एंड एडोल्सेन्ट मैडिसिन मे प्रकाशित अमेरिका मे ४३,०९३ वयस्कों पर किए गए एक सर्वे के नतीजो के अनुसार जिन लोगों ने १४ वर्ष से कम आयु मे शराब का इसतेमाल करना शुरु कर दिया था, उनमे से ४७ प्रतिशत शराब के गुलाम बन गए जबकि जिन लोगों ने २१ वर्ष के उम्र के बाद शुरु किया उनमे से ९ प्रतिशत ही नशेडी बने। अमेरिकी सरकार की सहायता प्राप्‍त प्रयोगशाला मे किशोर चुहों के दिमाग पर शराब के सेवन का परिक्षण किया गया जिसमे शराब का सेवन करने से होने वाली शारीरिक क्षति के सबसे गंभीर सबूत मिले हैं।
इन अध्ययनो मे पाया गया कि शराब पीने से अगले हिस्‍से तथा हिप्पोकैपस में गंभीर कोशकिय क्षति पहुँचती है। हालांकि यह सपष्‍ट नही है कि इन जांच परिणामो को मनुष्य पर कैसे लागू किया जा सकता है। इस खोज मे यह भी सबूत मिले हैं कि युवा शराबी मिलती जुलती कर्मियों से पिडित हो सकते है। अमेरिका सरकार द्धारा प्राप्‍त अनुसंधानकर्ताओं ने सान डिएगो मे लगभग ८ वर्ष तक अध्ययन किया। इस अध्ययन मे पाया गया कि शराब पीने वाले किशोरो ने मौखिक तथा अमौखिक परिक्षा मे बहुत ही घटिया प्रदर्शन किया। डयूक यूनिवर्सिटी में मनोवैज्ञानिक विभाग मे असिस्टेंट रिसर्च प्रोफैसर तथा कालेज परिसर मे अत्याधिक शराब खोरो पर हालिया अध्ययन के सहलेखक एरोन वहाइट कहते हैं कि 'अब इस बारे मे कोई संदेह नही है कि किशोर अवस्था मे शराब के अधिक सेवन से दूरगामी परिणाम बहुत भयंकर हैं ।डयूक मे किशोर चूहों पर अल्कोहल के प्रभाव पर हुई खोज मे शामिल डाँ व्हाइट कह्ते हैं, 'हम जानते है कि ५ या १० साल पहले अल्कोहल दिमाग को किसी अन्य ढंग से प्रभावित करती थी । इस ओर तत्‍काल ध्यान देने की आवश्यकता है'। रिसैप्‍टर्स एक या दो ड्रिंक लेने से अभिग्राही की क्रियाएं धीमी हो जाती हैं जबकि इस मे अधिक अल्कोहल का प्रयोग करने पर वे लगभग पूरी तरह ठ्प हो जाते है।

Friday, 28 March 2008

व्यवहार मे ढृडता कैसे लाए

व्यवहार मे ढृडता लाने का अर्थ यह कताई नही है कि आप दुसरो पर चिल्‍लाएं, रोब जमाएँ, गुस्सा करें, दोष लगाएं या उन्हे भयभीत करें । दृढ होने का अर्थ है कि आप अपने पक्ष मे खडे हैं और साथ ही दुसरों के अधिकारो का भी हनन नही कर रहे अर्थात स्पष्‍ट शब्दों मे अपनी बात कहना या सब के सामने रखना। यह आपकी भावनाओं, इच्छाओं, व विचारों का ईमानदार प्रस्तुतिकरण होता है। इसे प्राय: आपके आत्म-सम्मान व आत्म-छवि से भी जोडा जाता है।
बचपन मे ही हमारा निजी रवैया ढंग विकसित हो जाता है। उसपर हमारे परिवार, माहौल, और यारो-दोस्तो का भी असर पडता है। यदि बचपन मे आपको बडे अनुशासन मे रखें तो हो सकता है आप उन्ही विचारो को जीवन मे आगे चल कर पेश करें।
अपने व्यवहार मे दृडता लाने के लिए नाकारात्मक भाषणो व विचारो से बचना चाहिए जैसे " हो सकता है, मै गलती पर था या क्या तुम मेरे लिए ऐसा नही करोगे?" ऐसे वाक्यो से आपकी ढृडता टूटती है। जब भी आप किसी बात के लिए 'ना' कहना चाहे तो सपष्‍ट शब्दो मे कहें । उस समय शर्मिंदा हो कर या यह सोच कर कि सामने वाला नाराज़ होगा, माफी मागने की जरुरत नही है।
कई बार दृढता और आत्म-सम्मान की कमी को आपस मे जोड कर देखा जाता है । आत्म-सम्मान की कमी होने से इंसान अपने आप को हीन महसूस करता है और वह सब के सामने बोल नही पाता। यह मनुष्य को कई तरह से प्रभावित करती है । कई लोग इसकी वजह से गुस्सैल और आक्रमक हो जाते है । यही बर्ताव उन्हे और भी बुरा बना देता है । कुछ मामलो मे बीती बातें याद करके, दृढता अपनाने से हिचकते हैं क्योकि वह दुसरो को नाराज़ नही करना चहते।
यदि आपने दृढ रवैया नही अपनाया तो आपके साथ या नीचे काम करने वाले आपकी योग्यताओ व रवैये को गंभीरता से नही लेगें । यदि मीटिगं आदि मे आपने दृढता से अपना पक्ष नही रखा या दुसरो की अप्रसंन्नता के भय से अपना मत व्यक्त नही किया तो बाँस को आपकी योग्यता पर संदेह होने लगेगा।
इस तरह से दूसरे लोग आसानी से आपसे फायदा उठा सकते हैं और आपकी योग्यता पर संदेह कर सकते है। कुछ लोग बिना किसी वजह के ही माफी माँगते रह्ते है। यह उनकी अपनी शक्तिहीनता का संकेत होता है। जब तक आपने कोई गलती नही की, तो केवल एक 'साँरी' आपको दोषी बना सकता है। किसी भी परेशानी मे अपने परिवार व दोस्तो की मदद लें । दायित्व व परिस्थितियो से मुँह न मोडें। लगातार अभ्यास से अपने भीतर दृढता पैदा करें। यदि आप कही दृढता नही दिखा पाते तो शर्मिन्दा होने की बजाए अपने-आपसे वादा करें कि आप अगली बार ऐसा नही होने देंगे।
मनचाहा फल मिले या नही, अपने आपको प्रोत्साहित करते रहें। बेचैनी और व्याकुलता से बचें। अतीत से छूट्कर जीवन की नई यात्रा मे उसका साथ दें। अपने हृदय से सारी घृणा निकाल कर इसे प्रेम से लबालब भर दे, हालाकि यह इतना आसान नही है परन्तु लगातार प्रयास से संभव है। ऐसा करने पर ही आप स्वंय को मुक्‍त अनुभव कर पाएगे।
आप जब भी अपना तर्क प्रस्तुत करें तो मरियल स्वरों ने कहने के बजाए पूरे दम खम से अपनी बात कहें । बात करते-करते जहां वाक्य खत्म होने वाला हो वहां अपने स्वर को सम पर ले आएँ। किसी से बात करते समय बार-बार सिर न हिलाए, ज़रुरत से ज्यादा न मुस्कुराएँ, अपनी गर्दन एक ओर न झुकाए और न ही अपनी आंखे फेरें, सीधे नेत्रो का संपर्क बना रहे। गरिमामयी, आरामदायक मुद्रा मे बैठे । ध्यान रहे कि आपके चेहरे के भाव आपकी बात से मेल खानी चाहिए। दुसरो की बात को ध्यान से सुने व उन्हे ऐहसास दिलाएँ कि आप उन्हे सुन रहे है। यदि कोई स्पष्‍टीकरण चाहते है तो प्रश्‍न पूछे। अपनी शक्ति को कम न करें। जब भी आप बात करें तो ध्यान रहे कि आपकी पूरी बात स्पष्‍ट्ता से सामने वाले तक पहुँच रही है या नही?