Thursday 25 December 2008

दहेज़

लाखों लोग बर्बाद हो गये, इस दहेज़ की बोली में
अर्थी चढी हजारों कन्या, बैठ न पाई डोली में
जिस पर बीतती वाही जानता है, शब्द नहीं ये कहने के
कितनो ने बेचे मकान है, अब तक अपने रहने के
फ़िर भी वे रुके नहीं है, अब तक मानवता की भाषा में
अपनी मांग बढ़ते जाते, परधन की अभिलाषा में
आग लगे ऐशे दहेज़ को, मानवता की टोली में
लाखों घर बरबाद हो गये, इस दहेज़ की बोली में॥
अर्थी चढी हजारों कन्या, बैठ न पाई डोली में

तुमको भी दुःख होगा, अपनी कन्याओं की शादी में
मन ललचाना बंद करो, अब धैर्य रखो निज आधी में
कितनो ने अपनी कन्या के, पीले हाथ करने में
कहाँ -कहाँ न मस्तक टेके, आती शर्म बताने में
गहने, खेत, मकान रख दिए, सिर्फ़ मांग की रोली में
लाखों लोग बर्बाद हो गये, इस दहेज़ की बोली
में अर्थी चढी हजारों कन्या, बैठ न पाई डोली में


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