"स्वर से अपने कबर तुम्हारी खुदा रहा हूँ , खुदा कसम मैं,
किया है तुमने जो जुल्म हम पर सुना रहा हूँ, खुदा कसम मैं,"
अंग्रेजो की २०० वर्षो की जालिम हरकतों ने भारतियों को कैदें - बा -मुसक्कत रखते हुए नींदे हराम कर दी मगर उन्हें नही पता था की भारत माँ की कोख से जन्म लेने वाले, उनकी गोलियों से उनको ही मार कर उन्हें इस देश और मुल्क से बेपन्हा कर देंगे,१५ अगस्त १९४७ का वो स्वर्णिम दिन अपनेआप में ही अतीत का नज़ारा हमारी आँखों के सामने ला देता है , इस आज़ादी को प्राप्त करने के लिए हमारे अमर सपूतो ने कोई कसर बाकि नही रखी और न ही हमारी माँ बहनों के दिलो दिमाग पर इस चीज़ का जरा सा भी भय आया की उनके मांगो का सिंदूर बिखर जाइएगा, अतीत कर दर्द भरे दिनों को याद करते हुए मिर्जा ग़ालिब कर यह शेर जुबा पैर आ जाता है-
"शहीदों की चिताओ पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालो कर यही बाकि निशा होगा"
१८५७ के प्रथम स्वतंत्र संग्राम से लेकर १९४७ के भीषण रक्त पात एवं नर संहार की कहानी हमारे देश के प्रतेयक युवा वर्ग की नसों में बह रहे रक्त में एक अजब सा जोश ला देती है इस आज़ादी को हमे बरकरार रखना होगा उन वीर सपूतो के अरमानो तथा उनके द्वारा किए गए सतत प्रयासों पैर हमे अपनी द्रष्टि डाल कर अपने अंदर भी आस, हिमत और होसलो कर एक चिराग जलाए रखना होगा और हमें किसी भी कीमत पर अपनी आज़ादी की हसरतो को बरकरार रखना होगा
"अपनी आज़ादी को हम हार्गिज मिटा सकते नही,
सर कटा सकते है लेकिन सर झुका सकते नही "
हमारे वीर सपूतो की आशाओ , दृढ निश्चय
एवं सकारात्मक प्रयास जोर जोर की आवाजो से हमे आगाह कर रहे है , उनके पक्के इरादों में भी सफलता की चिंगारी देखने को मिलती थी
"हमारी आहो जारी से यह शाही रह न जायेगी , उन्ही की गोलिया उनको जहनुम भी दिखाएंगी ,
अगर हम आज मरते है तो कल तुम भी यह देखोगे , उन जालिमो की हस्ती भी यहाँ पर न रह पायेगी "
उन अमर शाहिदो पर हमें नाज़ होने चहिये जिनका नजरिया कुछ इस तरह था
"मैं स्वतंत्रता कर पागल प्रेमी मुझे जा की परवाह नही ,
शूलो से मेरा नाता है फूलो की मुझे चाह नही,
मरने पर भी ,स्थान पर लिखा मिलेगा स्वतंत्रता ,
लपटों में संदेश क्रांति की, देनी होगी मेरी लाल चिता"
Tuesday 12 August 2008
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